दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने हाल ही में सोशल मीडिया पर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए जनमत-संग्रह कराने का ऐलान किया था, जो उनकी विरोध की राजनीति का ही एक दूसरा नया नमूना है।

क्या केजरीवाल का दिल्ली को पूर्ण स्वायत्ता प्रदान करने के लिए जनमत-संग्रह कराने का विचार मुंगेरी लाल का हसीन सपना है? क्या दिल्ली की जनता से इसके लिए मत लेना उचित है या यह कदम देश में मुसीबतों के एक बड़े पिटारे को खोलने जा रहा है? केजरीवाल भले ही अपने उद्देश्य में सफल हों या न हों, लेकिन यह निश्चित है कि ग्रेट ब्रिटेन में जनमत-संग्रह के बाद उसके यूरोपीय संघ से बाहर निकलने का फैसला लेने के बाद केजरीवाल ने इसी तर्ज पर दिल्ली में भी जो जनमत-संग्रह के लिए ट्विट की है, उससे राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ चली है।

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग बहुत लंबे समय से उठाई जाती रही है। दिल्ली की पूर्व सरकारों ने भी इसी प्रकार की मांग उठाई थी, चूंकि उन्हें लगता था कि उनके हाथों में गिनी-चुनी सीमित शक्तियाँ हैं। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी अपनी मज़बूरी जताते हुए कहा था कि पुलिस उनके हाथ में न होने के चलते, वे दिल्ली को दहला देने वाले निर्भया बलात्कार मामले में अधिक कुछ नहीं कर सकीं। वे राष्ट्रीय राजधानी में अनेक एजेंसियों के खिलाफ थीं। भाजपा भी अतीत में इसी प्रकार की मांग दोहरा चुकी है।

पिछले महीने, केजरीवाल ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करने के लिए एक ड्राफ्ट बिल पेश किया। मसौदे में केंद्र सरकार के नियंत्रण के अधीन क्षेत्र, पुलिस, कानून व्यवस्था, भूमि और अन्य सेवाओं को नई दिल्ली नगरपालिका परिषद के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। आम जनता की राय मांगने के लिए उनके कार्यालय ने 30 जून तक का समय दिया था।

यदि इतिहास में झाँकें तो पता चलता है कि आपातकाल के तुरंत बाद, जनता पार्टी सरकार ने भारत का संविधान (44वाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 के माध्यम से जनमत-संग्रह कराने का प्रावधान प्रस्तुत किया था, लेकिन जो सफल नहीं हो पाया। भारत में गोवा ही एकमात्र ऐसा राज्य है जो कि पहले केंद्र शासित राज्य था, किन्तु गोवा ओपिनियन पोल 1967 के द्वारा अनुमोदन मिलने पर 1976 में गोवा असेंबली में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया और फिर राजीव गांधी के कार्यकाल में 1987 में यह पूर्ण राज्य बन गया।

दिल्ली को पूर्ण स्वायत्ता प्रदान करने के पक्ष में योगेंद्र यादव जैसे पूर्व आप नेता हैं, जिनका मानना है कि संविधान में इसके लिए प्रावधान न होने का बहाना बनाकर इस विषय को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। वहीं, जो लोग दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का विरोध कर रहे हैं, उनका तर्क है कि दिल्ली में संसद, उच्चतम न्यायालय, विदेशी दूतावास जैसी महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं। इसके अलावा, विश्व की अनेक राजधानियां जैसे बीजिंग, कैनबरा, वाशिंगटन, डीसी, ओटावा आदि का प्रशासन संघीय क्षेत्र के रूप में होता है न कि पूर्ण राज्य के रूप में।

विशेषज्ञों का मानना है कि संवैधानिक प्रावधानों के अभाव में इस मुद्दे पर पहले चर्चा होनी चाहिए। इससे पहले केजरीवाल दिल्ली की जनता से जनमत-संग्रह नहीं कर सकते।

दूसरे, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद अन्य केंद्र शासित राज्य भी इसी प्रकार की मांग कर सकते हैं, जिनका प्रशासन केंद्र सरकार उपराज्यपाल के माध्यम से चलाती है। इसके पीछे एक ऐतिहासिक कारण भी है। 1911 में भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाते समय अंग्रेज सरकार ने दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने के बजाय ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया।

स्वतंत्रता मिलने के बाद भी, भारतीय संविधान के शिल्पी डॉ. अंबेडकर ने ध्यान दिलाया था कि राष्ट्रीय राजधानी को किसी राज्य या स्थानीय सरकार के नियंत्रण के अधीन नहीं लाया जा सकता। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 ने दिल्ली को अन्य किसी राज्य में मिलने नहीं दिया और उसे राष्ट्रीय राजधानी के रूप में ही पहचान प्रदान की।

जब संसद ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदकान करने के लिए 1989 में राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991 पारित किया, तो उस पर सहमति नहीं बन सकी। सार्वजानिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि, इन तीन को छोड़कर दिल्ली असेंबली को अन्य सभी क्षेत्रों में शासन चलाने और कानून बनाने की शक्ति प्रदान की गई है।

तीसरे, जबकि कुछ देश, जिनमें यूरोपियन देश शामिल हैं, जनमत-संग्रह की विधि का इस्तेमाल देश के महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए जनता की राय मांगने में करते हैं, भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद ऐसा करने के लिए परिपक्व नहीं हो पाया है और इसके साथ-साथ यह विधि यहाँ काफी खर्चीली साबित हो सकती है।

इसलिए प्रश्न उठना लाजिमी है कि आखिर केजरीवाल बारंबार जनमत-संग्रह का राग क्यों अलापने लगते हैं? क्या इसलिए कि जनता का ध्यान उनकी सरकार और उनकी पार्टी को घेरने वाले विवादास्पद मुद्दों से भटक जाए? क्या इसलिए कि जनता का ध्यान ‘लाभ का पद’ विवाद पर उनके 21 विधानसभा सदस्यों पर लटक रही तलवार से हट जाए? केवल तीन संसद सदस्य होने के बावजूद आखिर संसद में वे संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत कैसे प्राप्त कर सकेंगे, ताकि वे दिल्ली में जनमत-संग्रह करा सकें? इन सभी प्रश्नों का उत्तर यही है कि केजरीवाल विरोध की राजनीति में विश्वास करते हैं और यही मुद्दों से जूझने का उनका अपना एकमात्र नायाब तरीका है।

साभार: कल्याणी शंकर
अंग्रेजी से अनूदित

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