आखिर क्यों की मोहन भागवत ने की शिक्षा पद्धति में बदलाव की वकालत?

RSS प्रमुख श्री मोहन भागवत ने एक बार फिर भारत की शिक्षा पद्धति को बदलने की पैरवी करते हुए कहा कि देश का गौरव बढ़ाने वाले पाठ्यक्रम लाने चाहिए। मैं शिक्षा परिवर्तन का समर्थक हूं। एक कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि नेशनलिज्म को वेस्ट में अलग तरह से मानते हैं। वहां इसका मतलब एक ताकतवर शक्ति से होता है। हमारा देश तो प्राकृतिक रूप से था। बाकी दुनिया के देश तो कृत्रिम हैं। कोई भाषा के आधार पर बना, कोई पंथ के आधार पर। हमारा अपना राष्ट्र जो बना था उसका स्पष्ट विवरण वेदों में है।

मोहन भागवत ने कहा कि हमारा देश टॉलरेंट है। यहां सभी प्रकार के संप्रदाय है। हमारा देश का संविधान जिन लोगों ने बनाया, वो सब इसी स्वभाव के थे। वो पंथ निरपेक्ष थे। हमारा राष्ट्र एक प्राकृतिक उत्पत्ति है। पिछले 200 सालों में मनुष्य को भ्रम में डालने वाली शिक्षा दी गई। हम लोगों को अपने समाज को शिक्षा परिष्कृत करके देनी होगी। पाठ्यक्रम बदलने कि प्रक्रिया चल रही है। थोड़ा समय लगेगा। सबसे विचार-विमर्श चल रहा है। विकृत पाठ्यक्रम बदलने कि जरूरत है। देश का गौरव बढ़ाने वाला पाठ्यक्रम लाया जाए। मैं शिक्षा परिवर्तन का समर्थक हूं।

हमारे देश में विवेकानंद भी आए, तिलक भी आए और गांधी जी भी आए। देश का गौरव बढ़ाने वाले पाठ्यक्रम होने चाहिए। जब तक वो परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक हमें अपने घर में वातावरण में दी जाने वाली शिक्षा में परिवर्तन करना चाहिए। शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की बेहद आवश्यकता है। मोहन भागवत ने कहा कि हमारे यहां कभी ये नहीं सोचा गया कि किस विद्या से मेरा करियर बनेगा। शिक्षा की आवश्यकता मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए होती है।

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