राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करे

भारतीय संस्कृति मूलत: अरण्य संस्कृति रही है भारत के वनों के सुरम्य, शांत और स्वच्छ वातावरण में चिंतन-मनन कर हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों-पुराणों, महाकाव्यों का सृजन किया है, जो आज भी मानवता के पथ-प्रदर्शक बने हुए हैं, इन्हीं वनों में नदियों के तटों पर, वृक्षों के नीचे या गुफाओं में तप कर ऋषि-मुनियों ने मानव-जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष और भगवद्भक्ति की प्राप्ति की है हमारे प्राचीन गुरुकुलों की स्थापना वनों में ही की जाती थी, जिससे कि ग्रामीण और नागरी दोनों परिवेश के विद्यार्थी प्रकृति माँ की गोद में रहते हुए उसके विभिन्न उपादानों के साथ आत्मीयता स्थापित कर सकें

यजुर्वेद में राजा को आदेश दिया गया है कि वह अपने राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करे विष्णु धर्मसूत्र, याज्ञवल्क्य स्मृति, स्कंद पुराण एवं अन्य ग्रंथों में वृक्षों और वनों के काटने को अपराध माना गया है और इसके लिए दंड का विधान किया गया है।

मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के जीवन की अधिकांश घटनाएँ वनों में ही घटित हुईं थीं और इसीलिए उन्हें अनेक स्थानों पर ‘वनप्रिय’ कहा गया है भगवान् श्रीकृष्ण तो बाल्यकाल में सखाओं के संग वनभोज और वनों में क्रीड़ा किया करते थे, वन की रक्षा हेतु उन्होंने दावाग्नि का पान किया था, गुरु संदीपनी ऋषि के आश्रम में रहते हुए वे वनों से यज्ञ हेतु समिधा लाते थे इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) के संस्थापक पांडवों को भी दुष्ट कौरवों के कारण वनों में जीवन व्यतीत करना पड़ा, जहाँ रहकर उन्होंने कष्टों से संघर्ष करने और विपत्ति में भगवान् की शरण लेने की शिक्षा प्राप्त की शकुंतलापुत्र भरत, जिनके नाम पर हमारे देश को भारतवर्ष कहा जाता है, भी वनों में सिंहों के दाँत गिन-गिनकर ही बढ़े हुए थे महाराणा प्रताप ने परतंत्रतापूर्ण जीवन व्यतीत करने के स्थान पर वनों में रहना और घास की रोटियाँ खाना स्वीकार किया था चंद्रगुप्त मौर्य ने वनों की सुरक्षा के लिए अधिकारी की नियुक्ति की थी




वनों की वर्तमान दुर्दशा:
दु:खद रूप से, आज वनों की महत्ता वाले उसी देश में भौतिकवादी संस्कृति के परिणामस्वरूप वनों का विध्वंस जारी है मानव-प्रेम के संकुचित होते दायरे में मात्र ‘पति-पत्नि और बच्चे’ को ही स्थान शेष बचा है, अतः वृक्षों और वनों की रक्षा हेतु कदम आगे बढ़ाने का आज किसके पास समय है? विडंबना यह है कि सरकार भी विकास नीतियों के नाम पर वनों की अंधाधुंध कटाई करने में जुटी हुई है, जिससे वन्य जीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं, प्रदूषण बढ़ रहा है

हमारी राष्ट्रीय वन नीति में देश के ३०% भाग पर वन क्षेत्र रखने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ८ जुलाई, २०१४ को जारी की गई १३वीं भारत वन स्थिति रिपोर्ट-२०१३ (ISFR-२०१३) के अनुसार देश में कुल वनावरण ६९.७९ मिलियन हेक्टेयर (६९७८९८ वर्ग किमी.) है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का मात्र २१.२३% है। स्वतंत्रता के समय देश के ४५% भू-भाग पर वन आच्छादित क्षेत्र था

संयुक्त राष्ट्र संघ की उपग्रह द्वारा जंगलों के छायाचित्र के आधार पर जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत का मात्र ८% भू-भाग ही वनाच्छादित रह गया है। वर्ष २००८ देश का वन विभाग अब तक यह दावा करता रहा था कि भारत के कुल भू-भाग में 19 प्रतिशत जंगल हैं

उपग्रहों के ताजे चित्रों के अनुसार देश में प्रतिवर्ष १३ लाख हेक्टेयर वन नष्ट हो रहे हैं। वन विभाग की ओर से प्रचारित वार्षिक दर की तुलना में यह दर आठ गुना अधिक है।

भारत में विश्व के ३.४% वन्य जीवप्राणी प्रजातियाँ और ७% वनस्पति प्रजातियाँ विद्यमान हैं, किंतु इसका वन क्षेत्र विश्व के २% से भी कम है अतः इसे विश्व की १५% से अधिक जनसंख्या का दबाव झेलना पड़ता है ।

वृक्षों की अंधाधुध कटाई और सिमटते जंगलों के कारण देश की भूमि बंजर और रेगिस्तान में परिवर्तित होती जा रही है। भारत में गत नौ वर्षों में २.७९ लाख हेक्टेयर वन विकास की भेंट चढ़ चुके हैं

भारत में केवल वन विनाश के कारण २.८६ लाख वर्ग किलोमीटर रेगिस्तान का विस्तार हो रहा है।

भारत में पुष्पयुक्त वृक्षों की लगभग ३०% प्रजातियाँ ऐसी हैं जो मात्र यहीं पाई जाती हैं। लेकिन वनों के विनाश से १५०० प्रजातियाँ विलुप्त होने वाली हैं




वनों के कटने से प्रतिवर्ष २ अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमण्डल में घुल-मिल रहा है और मिट्टी का कटाव शीघ्रता से हो रहा है। तापमान में वृद्धि के कारण २० से २५% फसलों का उत्पादन कम हो रहा है और पृथ्वी की उर्वरा शक्ति का ह्रास होता जा रहा है।

उत्तराखंड में वनों की कटाई से पहाड़ियाँ नंगी हो चुकी हैं, मृदा क्षरण के कारण भूस्खलन हो रहा है।

राजस्थान में वनों के विनाश से २७ जिले भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं। हिमाचल और कश्मीर में वर्तमान में आई आपदा का मुख्य कारण यहां के जगंलों की हो रही अंधाधुंध कटाई ही है। वनों की बेरहमी से हो रही कटाई से एक ओर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, वहीं प्रकृति का संतुलन भी बिगड़ रहा है। लाखों की संख्या में वन्य जीव लुप्त हो रहे हैं।

वायु प्रदूषण बढ़ रहा है ओजोन परत बढ़ने में भी वनों की अंधाधुंध कटाई उत्तरदायी है। वन्य वस्तुओं का अभाव होता जा रहा है।

उत्तराखंड में वनों की अंधाधुंध कटाई और नदियों के कोख को लहूलुहान करने का प्रकृति पहले भी अपना रौद्र रुप दिखा चुकी है

ओजोन की पट्टी पतली हुई जा रही है , इस गैस के अभाव में निरंतर वायुमंडलीय तापमान में वृद्धि होता जा रहा है |

विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र चेरापूँजी में वर्षा के चार महीने छोड़कर जल की भयंकर समस्या रहती है और पूरे वर्ष में औसतन ९१५० मि. मीटर वर्षा होती है, जिसका कारण है वृक्षों और वनों की अंधाधुंध कटाई और भूमि व जल संरक्षण के प्रति लापरवाही

हिमालय की सतह पर खड़े औषधीय वृक्ष-पौधों व जड़ी बूटियों की शृंखला नष्ट होती जा रही है

मध्यप्रदेश के सिवनी जिले की बैनगंगा (वेणुगंगा) नदी पर बालाघाट जिले तक विद्यमान बांस का विशाल वन पेपर मिलों का दैत्याकार पेट भरने के लिए काट-काटकर समाप्त किया जा रहा है।

घने वनों और वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध मध्य प्रदेश का सिंगरौली और विंध्य क्षेत्र आज कोयला खदानों, विद्युत परियोजनाओं और पर्यावरण प्रदूषण के लिए भारत में जाना जाता है। स्थानीय लोग प्रदूषण से उत्पन्न अनेक रहस्यमय रोगों के शिकार हैं।

उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में पहाड़ी क्षेत्र में वनों की कटाई से भूस्खलन और वर्षा से नदियों में बाढ़

उत्तराखंड में ४४८६८ हेक्टेयर वन भूमि गैर-वनभूमि बन चुकी है। ५५०० हेक्टेयर वनभूमि अकेले बिजली परियोजनाओं की भेंट चढ़ी है। इसके साथ-साथ भवन निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर वृक्ष काटे जा रहे हैं।

१९७० के दशक में गढ़वाल में बिरही, चमोली तहसील की अलकनंदा भयानक बाढ़ का कारण बड़े पैमाने पर वृक्षों और वनों की कटाई था।

भारत नेपाल की तराई में बसे लखीमपुर खीरी जिले में वन गायब होते जा रहे हैं (२८ जुलाई २०१२ रिपोर्ट)

जहाँ एक ओर मध्य प्रदेश सरकार ५ जून को पर्यावरण दिवस पर हरियाली महोत्सव मना रही थी, बहरी वन परिक्षेत्र के अंतर्गत पोड़ी नर्सरी में वन विभाग ने ४०० सागौन व लिपटस के वृक्ष काट डाले (६ जून २०१४ समाचारपत्र रिपोर्ट) सीधी

धौलाकुआं वन परिक्षेत्र माजरा, गिरीनगर, कोलर वन के वनों में वृक्ष काटकर स्थानीय आरा मशीनों में पहुँचाए जा रहे हैं। (२८ मार्च २०१४ समाचारपत्र रिपोर्ट)

मध्यप्रदेश अनूपपुर/कोतमा कोतमा परिक्षेत्र गोढ़ारू जंगल में अवैध खनन के बाद भी वन विभाग ध्यान नहीं दे रहा डिप्टी रेन्जर वृक्षों की अवैध कटाई करने वाले के साथ है (२५ सितंबर २०१४ समाचारपत्र रिपोर्ट)

पूरे एशिया में सागौन के वृक्षों के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के बैतूल के घने जंगलों में वन अधिकारियों की शह पर वन माफिया छा गए हैं और वे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई कर रहे हैं। (१० फरवरी २०१४ समाचारपत्र रिपोर्ट)

राजस्थान के भीलवाड़ा में अवैध रुप से लकडिय़ां, चिराई, कटाई और परिवहन करने के मामले प्रकाश में आ रहे हैं, किंतु वन विभाग और पुलिस विभाग मूक दर्शक बने हुए हैं। (३ मई २०१३ समाचारपत्र रिपोर्ट)

सघन जंगलों के लिए प्रसिद्ध बिहार के चौपारण क्षेत्र में वन विभाग के कर्मियों की सांठ-गांठ से वन तस्कर अनेक वर्षों से लकड़ी की तस्करी, पत्थरों का अवैध खनन कर रहे हैं (१९ अप्रैल २०१४ समाचारपत्र रिपोर्ट)

गोरखपुर में महराजगंज जिले की विधान सभा पनियरा में नटवा जंगल और टिकरीया में प्रतिदिन वृक्ष काटे जा रहे हैं (३० दिसंबर २०१३ रिपोर्ट)

उड़ीसा के रायगढ़ के बडगांव में ३ लाख से अधिक सराई और बीजा प्रजाति के वृक्ष काट दिए गए, जिनमें शासकीय आरा मशीनों के प्रयोग से वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई (२ मार्च २०१३ समाचारपत्र रिपोर्ट)

छत्तीसगढ़ के रायपुर में पिथौरा के दुरुगपाली-फुटगुना मार्ग पर एक किलोमीटर रिजर्व जंगल काट दिया गया और वन रक्षक से लेकर डीएफओ तक किसी को जानकारी तक नहीं हुई। (१६ मार्च २०११ समाचारपत्र रिपोर्ट)

वन विवाद

१. वनवासी भाई-बहिनों के साथ अन्याय
वनवासियों का जन्मजात जुड़ाव वनों से रहा है। वनभूमि उनकी माँ है, जिसके आंचल की छांव में उनकी संस्कृति सुरक्षित रही है और जिसके जल, जंगल और जमीन उनके लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय रहे हैं और उनकी रक्षा हेतु उन्होंने अपने जीवन का बलिदान देने में विलंब नहीं किया है वस्तुतः वनवासियों ने वनों से कुछ लिया भी है तो उन्हें अपना तन-मन और हृदय का नि:स्वार्थ प्रेम समर्पित कर पाला-पोसा भी है

अंग्रेज व्यापारियों ने जब भारत के वनों में बिखरी अकूत प्राकृतिक संपदा देखी तो उन्होंने उसे हथियाने के लिए कानून का सहारा लिया वर्ष १७९३ में प्रथम बार ‘‘परमानेंट सेटलमेंट एक्ट’’ लागू कर वनवासियों की वन-भूमि जमींदारों के हाथों में सौंप दी गई। वर्ष १८५५ में सरकारी नीति लागू कर घोषणा कर दी गई कि वन सरकार के हैं और उन पर किसी व्यक्ति का अधिकार नहीं है। वर्ष १८६५ में भारत में प्रथम वन अधिनियम लागू कर वनों को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। उसके बाद तो वन कानूनों की कतारें लग गईं जहाँ भी अंग्रेजों को कानून में कोई छेद दिखाई देता तो उसके लिए नया कानून वे लागू कर देते। वन अधिनियम १९२७ द्वारा सभी प्रकार की वन उपजों पर लगान लगा दिया गया।

भारत के स्वतंत्र होने पर भी अंग्रेजी मानसिकता न गई तथा कानून वनवासियों के लिए और भी सख्त होते गए वर्ष १९५२ में राष्ट्रीय वन नीति घोषित कर वनवासियों को वन उजाड़ने का दोषी ठहराया गया। वर्ष १९७२ में वन्यजीवन सुरक्षा हेतु कानून लागू कर लाखों वनवासियों को वनों से इसी भाँति खदेड़ दिया गया, जैसे एक माँ की गोद से उसके दुधमुंहे बच्चे को छीनकर अलग किया जा रहा हो। वर्ष १९७६ में राष्ट्रीय कृषि आयोग ने घोषणा की कि वनवासी ही वनों का नाश कर रहे हैं, अतः वनों की सुरक्षा हेतु वनवासियों को वनों से बाहर निकालना आवश्यक है। वर्ष १९८० में ‘वन संरक्षण अधिनियम’ लागू कर वन का एक पत्ता तोड़ना भी अपराध की श्रेणी में रख दिया गया और उसके लिए दंड के प्रावधान किए गए।

वन अधिनियम १९८८ के अंतर्गत उद्योगों को वन भूमि लीज पर देने के नियमों में ढिलाई देने पर उद्योग समूहों ने लाखों हेक्टेयर वनभूमि लीज पर लेकर वनों के विनाश से जुड़े कारोबार स्थापित कर लिए।




वर्ष २००२ में वनों में रह रहे १ करोड़ वनवासियों को समय सीमा के अंदर वन खाली करने के निर्देश दे दिए गए, क्योंकि वे वन एवं वन्यजीवन की सुरक्षा में खतरा बन चुके थे। इस प्रक्रिया में भारत भर में २५००० वनवासी परिवारों के घर तोड़ डाले गए असम और महाराष्ट्र में यह कार्य करने के लिए बुलडोजरों और हाथियों को लगाया गया। १ लाख वनवासियों को जेल के सीखंचों के पीछे डाल दिया गया लेकिन सरकार ने वनों का विध्वंस करने वाले ठेकेदारों, पूंजीपतियों और वन अधिकारियों के विरुद्ध एक भी कदम नहीं उठाया

सरकार द्वारा वनवासियों के इस उत्पीड़न के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं अंततः वन अधिकार कानून २००६ लागू करते समय सरकार ने प्रथम बार कानूनी रूप से स्वीकार किया कि गत १७५ वर्षों में वनवासियों के साथ ऐतिहासिक रूप से अन्याय हुआ है जिसके निवारण हेतु यह कानून बनाया गया है किंतु विडंबना यह है कि इस कानून के लागू होने के बाद भी सरकार और वन विभाग द्वारा वनवासियों को वनों के अधिकार देकर उन्हें वन संरक्षण और संवर्धन के कार्य में सक्रियता से जोड़ने के कोई भी ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हैं और इसके कारण हैं-

(i.) वन विभाग को स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा जमींदार माना जाता है यद्यपि वन अधिकार कानून २००६ लागू होने के पश्चात् वन विभाग समाप्त हो जाने चाहिए थे किंतु वन विभाग वनवासियों को वनों पर इसलिए अधिकार नहीं देना चाहता, क्योंकि उसके अधिकारी और कर्मचारी वन माफियाओं और तस्करों से सांठ-गांठ कर करोड़ों रूपए की कमाई करते हैं, इसके अतिरिक्त उन्हें लाखों रूपए की लकड़ी भी अपने घरों को सजाने के लिए निःशुल्क मिलती है।
(ii.) भारत के वनों में लौह-अयस्क, कोयला आदि खनिज पदार्थ बिखरे पड़े हैं झारखंड के सारंडा वन में भारत का २५% लौह-अयस्क विद्यमान है, जिसका उत्खनन करने में लगभग ३० खनन कंपनियाँ लगी हुईं हैं वनवासियों को वन अधिकार देने पर उत्खनन कार्य व्यापक स्तर पर प्रभावित होगा।
इन कंपनियों से सरकार को भारी धनराशि राजस्व के रूप में प्राप्त होती है, जिसे सरकार किसी भी दशा में वनवासियों के हाथ में जाने नहीं देना चाहती। अतः पुलिस सारंडा वन के मुंडा वनवासियों पर अत्याचार कर रही है।

यही कारण है कि खनिज संपदा के लिए प्रसिद्ध कैमूर और सोनभद्र के वनों पर वन-विभाग, पूँजीपतियों, कम्पनियों व माफियाओं का कब्जा है। झारखंड में वन अधिकार कानून २००६ के अंतर्गत वन अधिकार समिति का गठन तो हुआ लेकिन राज्य में आजतक एक भी सामुदायिक अधिकार का पट्टा नहीं दिया गया है मध्यप्रदेश के महान जंगल पर ५४ गाँव के वनवासी निर्भर हैं, लेकिन उन्हें वन अधिकार कानून का कोई लाभ नहीं मिल सका है

जब सरकार आर्थिक विकास के लिए जंगलों को ही साफ करने में लग गई है तो ऐसी दशा में वनवासी बंधु रहें तो कहाँ? वन आधारित उनकी जीवन शैली वनों के अभाव में कैसे संभव है?

एक ओर सरकार विलुप्तप्राय वन्य प्राणियों के संरक्षण हेतु करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर वनों में वृक्षों की पूजा करने वाले वनवासियों को वनों से अलग करती जा रही है। वनक्षेत्रों में निर्धनता के कारण निरक्षरता, धर्मांतरण, सामाजिक कुरीतियाँ पनप रही हैं वनवासी, शासन द्वारा चलाई जा रही विभिन्न जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित हैं

चिपको आंदोलन से जुड़ी बचनी देवी आँखों से आंसू बहाते हुए कहती हैं, “सरकार ने हमारे नारे तो कई जगह शामिल कर लिये किंतु वनों में रिजर्व क्षेत्र बनाकर हमारे अधिकार छीन लिए. हालत यह है कि हम वनों से सूखे वृक्ष भी नहीं ले सकते. निजी ठेकेदार गये तो वन निगम आ गया. आखिर हम किस-किससे लड़ें?”

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कुछ दिन पूर्व पोर्ट ब्लेयर में अंडमान एवं निकाबोर जनजातीय शोध संस्थान का उद्घाटन करते हुए देश से कई वनवासी समुदायों के विलुप्त होने पर चिंता प्रकट की। लेकिन दूसरी ओर उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में पॉस्को की बारह अरब डॉलर की विशालकाय इस्पात संयत्र परियोजना पर्यावरण मंत्रालय द्वारा और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा रोक लगाने के बाद भी नए मंत्री वीरप्पा मोइली द्वारा स्वीकृत कर दी गई, जिससे २२००० वनवासी बंधु तो विस्थापित होंगे ही, साथ ही पर्यावरण पर भी गंभीर दुष्प्रभाव पड़ेंगे। देश के आर्थिक विकास की गति धीमी होने की चिंता में दुबले होने वाले हमारे उद्योगपति कभी पर्यावरण और वनवासी हितों के लिए चिंतित क्यों नहीं दिखते?




२. व्यापारिक वृक्ष
सरकार उजड़ चुकी वन भूमि को लकड़ी-आधारित उद्योगों के हाथों में देना चाहती है। अतः विदेशी कंपनियों की सहायकता से वनों में व्यापारिक वृक्ष लगाए जा रहे हैं, जिसका वनवासियों द्वारा विरोध किया जा रहा है आज बहुत से वनवासी बहिनों का सारा जीवन ईंधन और चारा जुटाने में ही बीत जाता है, लेकिन उनकी ओर सरकार की कृपादृष्टि पड़नी असंभव प्रतीत होती है

पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट के अनुसार उत्तराखंड को आपदा से बचाने के लिए सरकार को ऐसी प्रजाति के वनों का विकास करना चाहिए जो जल की मारक क्षमता को कम करे और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के साधन बन सकें।

भारत के वन क्षेत्र में गत वर्षों में कतिपय वृद्धि दर्शाई गई है। किंतु ऐसी वृद्धि पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए समाजशास्त्रियों एवं तकनीकी वानिकी विशेषज्ञों ने पूछा है कि क्या यह वृद्धि उस वनस्पति एवं सम्पदा की हो रही है, जो स्थानीय लोगों के लिए उपयोगी हैं, जो उनकी प्रतिदिन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है

वन-विभाग द्वारा विदेशी धन से सफेदा, सागौन, यूकेलिप्ट्स, जेट्रोफा, चीड़ आदि के वृक्ष लगाए जा रहे हैं जो न तो मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ाते हैं न मिट्टी का संरक्षण और जल संचय कर सकते हैं। ये वृक्ष मात्र शहरी और उद्योगों के बाजार की मांग पूरी करने के उद्देश्य से लगाए जाते हैं इन वृक्षों से वनों की जैव-विविधता नष्ट हुई है और साथ ही वनवासियों की आजीविका का भी विनाश हुआ है, जिससे उनमें निर्धनता बढ़ी है बंजर भूमि में वृक्षारोपण से हुए भूमि सुधार से निर्धनता कम करने और और रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने में बहुत सहायता प्राप्त हो सकती है।

कर्नाटक में हासन जिले के येलगूंडा गांव की ६०० एकड़ वन भूमि से वनवासियों को ईंधन और चारा मिलता था। किंतु वन विभाग ने उस भूमि पर सफेदे के वृक्ष लगा डाले, वर्ष १९८२ में रैयत संघ ने एक आंदोलन प्रारंभ कर सफेदे के वृक्ष उखाड़ फेंके। अंत में वन विभाग से बहस के पश्चात्, वह भूमि ६०० भूमिहीन और सीमांत किसानों में वितरित कर दी गई, जिसमें उन्होंने इमली और कटहल के वृक्ष लगाए और रागी की खेती की। रैयत संघ अब एक ग्रामीण सहकारी समिति बनाकर उसके माध्यम से निर्धन वनवासियों हेतु इस खेती से छोटा उद्योग आरंभ करने की योजना बना रहा है।

झारखंड की वनवासी महिलाएं बांस के रोजगार से जुड़कर वे अपनी आजीविका चला रही हैं और स्वावलंबी हो रही हैं। बांस के ईको-फैंडली उत्पादों की रांची, चेन्नई, कोलकाता के साथ-साथ नार्वे देश में भी अत्यधिक मांग है (जून २०११ समाचारपत्र रिपोर्ट)

क्या सरकार वनवासी भाई-बहिनों के कल्याण हेतु इस प्रकार के कदम नहीं उठा सकती?




३. विकास योजनाएँ
जलविद्युत परियोजनाएं, सड़क विस्तारीकरण, शहरीकरण, भवन निर्माण, कोयला खनन, खनिज उत्खनन और विकास संबंधी अन्य औद्योगिक परियोजनाओं में व्यापक स्तर पर वृक्षों और वनों को उजाड़ा जाता है। अधिकतर मामलों में कुछ वृक्षों को काटने की अनुमति ली जाती है और जंगल के जंगल साफ कर दिए जाते हैं।

भारत के 68वें स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि औद्योगीकरण तो हो किंतु इससे पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। आज पर्यावरण और विकास में समन्वय की नितांत आवश्यकता है।

एशिया के सर्वश्रेष्ठ जंगलों में से एक और भारत में सर्वाधिक हाथियों की शरणस्थली झारखंड के
सारण्डा के घने जंगल में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा पर्यावरण मंत्रालय की रोक के बाद भी खनन के पट्टे आबंटित कर दिए फलस्वरूप आज सारण्डा मात्र कहानियों का भाग बन कर रह गया है। घर उजड़ने के बाद यहाँ से अधिकांश हाथी भाग चुके हैं। (८ जनवरी २०१० समाचारपत्र रिपोर्ट)

उच्चतम न्यायालय द्वारा सितंबर २०१४ में २१४ कोल ब्लॉक के आबंटन रद्द कर दिए जाने के पश्चात् नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने महान कोल लिमिटेड की पर्यावरण मंजूरी को रद्द किया, जिसे लगभग ५ लाख वृक्ष कटते और ५० हजार वनवासियों की आजीविका प्रभावित होती। महान संघर्ष समिति और ग्रीनपीस ने सिंगरौली (मध्यप्रदेश) की माड़ा तहसील में स्थित महान के घने जंगल क्षेत्र को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई




४. वन कटाई
वन संरक्षण अधिनियम १९८० के अंतर्गत केंद्रीय मंत्रालय की स्वीकृति के बिना वनक्षेत्र का एक हेक्टेयर भी गैर-वन उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त करने पर प्रतिबंध था।

वनवासी बहुल राज्यों बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, असम, पश्चिमी बंगाल में वन तस्कर जंगलों का सफाया करने में लगे हुए हैं वीरप्पन के मरने के बाद अब उसके संबंधियों और मित्रों ने कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में वन तस्करी की कमान संभाल ली है

पुरुलिया में १७-१८ दिसंबर १९९५ को आनंदमार्गियों के लिए गिराए गए अत्यंत घातक शस्त्रों का भंडार उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के वन तस्करों और उनके संबंधियों के पास होने की आशंका है, जिनके द्वारा ये वनवासियों और वनरक्षकों का भयादोहन करने में लगे हैं. पुलिस का तालमेल वन रक्षकों और अधिकारियों की अपेक्षा वन तस्करों से बेहतर है

वन रक्षकों को प्राप्त राइफलें और बंदूकें अपर्याप्त हैं. वन मंत्रालय को गृह मंत्रालय से बात कर वन रक्षकों के लिए अत्याधुनिक शस्त्र उपलब्ध कराने चाहिएं




५. वन विभाग की अविश्वसनीय रिपोर्ट
वन विभाग की रिपोर्टों के दावे पर्यावरणविदों, विशेषज्ञों, वनवासियों के साथ-साथ सामान्य जनता के लिए भी अविश्वसनीय रहे हैं

पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ८ जुलाई, २०१४ को जारी की गई १३वीं भारत वन स्थिति रिपोर्ट-२०१३ (ISFR-२०१३) के अनुसार देश में कुल वनावरण में वर्ष २०१० और २०१२ की अवधि में ५८७१ वर्ग किमी. की वृद्धि हुई है किंतु वास्तविकता यह है कि लगभग ३८०० वर्ग किमी. की वृद्धि मात्र एक राज्य में हुई है और वह भी पिछले आँकड़ों में एक सुधार के कारण

देश में कुल वनावरण ६९.७९ मिलियन हेक्टेयर (६९७८९८ वर्ग किमी.) है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का मात्र २१.२३% है, लेकिन एन्वायरनमेंट इम्पेक्ट एंड एससमेंट रिसोर्स एंड रेस्पोंश सेंटर के अनुसार गत वर्ष प्रतिदिन औसतन १३५ हेक्टेयर (३३३ एकड़) वनभूमि विद्युत, खनन और अन्य विकास योजनाओं हेतु आबंटित की गई थी, अतः यह वृद्धि वास्तविक प्रतीत नहीं होती

पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों का तर्क है कि वन विभाग के सर्वेक्षण उपग्रह चित्रों पर आधारित हैं, जो कि लघु क्षेत्रों में हो रही वन-कटाई की छवि नहीं ले पाते इसके अतिरिक्त रिपोर्ट में वन की परिभाषा अत्यंत व्यापक है इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस इन बंगलौर के एनएच रविंद्रनाथ के नेतृत्व में वैज्ञानिकों द्वारा मई २०१४ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष १९९७ और २०११ की अवधि में हुई ७ मिलियन हेक्टेयर वनावरण की वृद्धि व्यापारिक वृक्षों में वृद्धि के कारण हुई वन संरक्षण के उद्देश्य से सफेदा, सागौन, यूकेलिप्ट्स, जेट्रोफा, चीड़ आदि के वृक्षों को वनावरण में सम्मिलित करना समीचीन नहीं है इसी के साथ-साथ भारत वृक्ष कटाई की कम संख्या दर्ज कर वनावरण को बढ़ाने का भी प्रयास करता रहा है

वन रिपोर्ट तैयार करने वाले भारतीय वन सर्वेक्षण के एक संयुक्त निदेशक रणजीतसिंह गिल ने वर्ष २०११ में मेघालय में वन-वृद्धि का झूठा दावा कर रहे अपने ही विभाग के विरुद्ध आवाज उठाई, क्योंकि मेघालय में सीमेंट संयंत्रों द्वारा उत्खनन और अवैध कटाई के चलते वन नष्ट किए जा रहे थे, लेकिन विभाग उलटी छवि प्रस्तुत कर अपनी पीठ थपथपाने में लगा था

आंकड़ों का मायाजाल देखिए कि उत्तराखंड में २००१ में जहाँ २३९३८ वर्ग किमी वन क्षेत्र था जो बढ़कर २०११ में २४४४६ वर्ग किमी हो गया। किंतु महीन अंतर यह है कि कागजों में वन भूमि का रकबा बढ़ा है, वन नहीं। वन विभाग ग्लेशियरों के पिघलने और पीछे हटने से बची भूमि को भी वन क्षेत्र में गिनता है। (२१ मार्च २०१४ समाचारपत्र रिपोर्ट)




उत्तराखंड में ६५% वन क्षेत्र होने का दावा किया गया, किंतु यह जंगल नहीं बल्कि जंगलात की जमीन है। वास्तविक घने वन जंगल तो क्षेत्र में मात्र ३५% हैं। १०% छितरा हुआ वन है। वन विभाग ढ़ोल पीट रहा है कि चंदौली को छोड़कर क्षेत्र के समस्त जिलों में वृक्षारोपण का लक्ष्य न केवल प्राप्त किया गया है अपितु अधिकांश जिलों में तो लक्ष्य से आगे जाकर वृक्षारोपण किया गया। किंतु विभाग के पास इस बात की कोई सूचना नहीं है कि गत पांच-दस वर्षों में क्षेत्र में कितने वृक्ष काटे गए। (१५-२१ जुलाई २०१२ समाचारपत्र रिपोर्ट)

६. दावाग्नि
उत्तराखंड में प्रतिवर्ष हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ जाता है। वर्ष १९९३, २००५ और २००९ में तो वनाग्नि ने इतना भयंकर रूप दिखाया था कि बड़ी संख्या में पशु और व्यक्ति काल के ग्रास बने दावाग्नि से प्रति वर्ष करोड़ों रुपए की वन संपदा जलकर खाक हो जाती है।

वन विभाग के अनुसार वनवासी विभिन्न कारणों से वनों में आग लगा देते हैं। उधर, वनवासी और ग्रामीण वन विभाग पर आरोप लगाते हैं कि प्रतिवर्ष कागजों पर होने वाले फर्जी वृक्षारोपणों को छिपाने के लिए वन विभाग स्वयं जंगलों में आग लगा देता है। भारतीय वन संस्थान के एक अनुसंधान के अनुसार चीड़ के जंगल से प्रतिवर्ष छह टन तक पिरुल गिरता है, जिसमें अत्यधिक मात्रा में ज्वलनशील तेल होता है। अनजाने में फेंके गए बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े या गाड़ियों के बैक-फायर की चिंगारी इसके संपर्क में आकर आग के रूप में भड़क उठते हैं। प्रश्न यह है कि इन पत्तियों को समय से क्यों नहीं उठाया जाता है

वनवासी, वन्य जीव और वन्य संपदा के लिए दावाग्नि अत्यंत भयानक सिद्ध होती है दावाग्नि के कारण हरे-भरे वृक्षों के जलने से उपजाऊ मिट्टी का कटाव शीघ्रता से होता है, जिससे जल संरक्षण का काम भी प्रभावित होता है। प्रतिवर्ष गर्मियों में उत्तराखंड के जंगल धू-धू कर जलते हैं और यह दावाग्नि मानसून पूर्व वर्षा की फुहार पड़ने पर ही शांत होती है उत्तराखंड के ६५% भाग में वन हैं, किंतु प्रतिवर्ष हजारों हेक्टेयर जंगल राख हो जाता है।

दावाग्नि को बुझाने हेतु पहले गर्मियों के चार महीनों के लिए प्रत्येक गाँव में एक अस्थायी आग-पतरोल रखा जाता था, जो आग लगने पर ग्रामीणों को एकत्र करता था। आग बुझाने के लिए आने वाले ग्रामीणों को वन्यसंपदा में प्राथमिकता मिलती थी। किंतु अब ये परंपराएं बंद हो गई हैं।’ सरकार द्वारा जंगलों से वनवासियों को खदेड़ दिए जाने से अब वनों के प्रति उनके हृदय में पहले जैसी ममत्व भावना क्षीण होती जा रही है वन विभाग उनके लिए खलनायक की भूमिका निभाता रहता है, अतः दावाग्नि बुझाने में वे उसकी सहायता क्यों करें?

७. वृक्षारोपण के पश्चात् वृक्षों का संवर्धन और संरक्षण
पर्यावरण दिवस और अन्य विशेष दोनों पर कभी-कभी माननीयों द्वारा यश के लिए या खानापूर्ति के लिए पौधारोपण किया जाता है, किंतु पौधों को लगाने के पश्चात् उनकी देखभाल का उत्तरदायित्व किसी का नहीं होता अतः कुछ समय बाद वे पौधे कूड़े में भी ढूँढने से नहीं मिलते, जिससे पौधारोपण कार्यक्रम में व्यय हुई करोड़ों रुपए की धनराशि व्यर्थ हो जाती है

वर्ष १९८० में सरकार द्वारा पौधारोपण विभाग खोले गए थे, जिसके अंतर्गत एक समय में लाखों पौधे रोपण कर गिनीज बुक में रिकॉर्ड दर्ज करने का प्रयास किया गया, किंतु रोपे गए पौधों के संरक्षण पर ध्यान न देने के कारण तीन दशक में जहाँ पुनः नए जंगल खड़े हो जाने चाहिए थे, वहाँ कटे हुए वृक्षों के ठूंठ भी दिखाई नहीं देते।

८. पर्यावरण मंत्रालय
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा पर्यावरण और वनवासियों के लिए हानिकर परियोजनाओं पर रोक लगाए जाने पर उद्योगपति इसे भारत के आर्थिक विकास के लिए हानिकर मानते हैं कुछ विद्वानों के अनुसार सरकार को पर्यावरण मंत्रालय को समाप्त कर ऐसी संस्था का गठन करना चाहिए, जिसमें पर्यावरण विशेषज्ञ और वैज्ञानिक हों और राजनीतिक हस्तक्षेप न हो। ऐसी संस्था पर पर्यावरण के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाकर करोड़ों रुपए एकत्र करने वाले एनजीओ अपना नियंत्रण न कर सकें।

वन एवं पर्यावरण किसी भी राजनीतिक दल अथवा सरकार की नीतियों के केंद्र में नहीं हैं। बिना दृढ़ राजनीतिक इच्छा-शक्ति के वनों का संरक्षण असंभव है।

पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार यूपीए सरकार के एक दशक के कार्यकाल में २.४३ लाख हेक्टेयर वनक्षेत्र उद्योगों और विकास परियोजनाओं को सौंप दिए गए। इसके अतिरिक्त, वर्ष २००४ से २०१३ के बीच तेल और खनन की संभावनाओं को तलाशने के लिए १.६४ लाख हेक्टेयर वनभूमि दे दी गई।

सरकार को मंथन करने की आवश्यकता है कि पर्यावरणीय विनाश के मूल्य पर किया जाने वाला आर्थिक विकास कितना वांछित है तथा क्या वन संरक्षण कानून और उच्चतम न्यायालय विकास-विरोधी हैं?

९. विकास के पैमाने के रूप में लागू हो जीईपी
उत्तराखंड जैसे वनबहुल राज्यों के वास्तविक विकास की स्थिति जानने के लिए सरकार ने जीईपी (ग्रीन एनवायरनमेंट प्रोडक्ट) या ग्रीन जीडीपी को लागू करने की योजना बनाई थी, जिससे यह ज्ञात हो सके कि विकास नीति के कारण पर्यावरण को कितनी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ी। प्रदेश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में से इस कीमत को घटाने पर वास्तविक विकास का ज्ञान होता। किंतु, यह काम एक विशेषज्ञ समिति को सौंप दिया गया है और उसके आगे कोई प्रगति नहीं हो पाई है।

१०. क्षतिपूर्ति वनीकरण का अप्राप्त लक्ष्य
जर्मनी के नॉर्थ राइन वेस्टफालिया राज्य की सरकार ने द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् यह नियम बनाया कि वनक्षेत्र में उत्खनन करने वाले उद्यमी को एक नवीन वनक्षेत्र के विकास की संपूर्ण योजना प्रस्तुत करनी होगी और उसके लिए सरकार के समक्ष प्रतिभूति जमा करनी होगी।

भारत सरकार ने भी उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर वन संरक्षण अधिनियम १९८० के अंतर्गत सभी प्रदेशों में कंपेंसेटरी फॉरस्टेशन मैनेजमेंट प्लानिंग अथॉरिटी (कैंपा) का गठन किया है, जिनके अनुसार विकास योजनाओं हेतु वन भूमि का प्रयोग करने वालों को दस गुने वृक्ष उसी प्रजाति के लगाने होंगे और उन वृक्षों को लगाने की राशि जमा करनी होगी। किंतु, क्षतिपूर्ति वनीकरण का मात्र १२% ही लक्ष्य पूरा किया जा सका है।

उत्तराखंड में इसका क्रियान्वयन अत्यंत हास्यास्पद रूप से किया जा रहा है। टिहरी की जल विद्युत परियोजना के लिए शिवालिक क्षेत्र में काटे गए वनों के लिए कैंपा के अंतर्गत भूमि झांसी के पास बुंदेलखंड में वितरित की जा रही है। काटे गए मिश्रित वनों के स्थान पर शीघ्र उगने वाले अनुपयोगी वृक्ष लगाए जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में ‘कैंपा’ के पास ४०० करोड़ रुपए जमा हैं और वन विभाग के पास पिछले दशक में काटे गए वृक्षों के संबंध में कोई आंकड़ा नहीं है। फैजाबाद, बाराबंकी में सड़क को चौड़ा करने के लिए काटे गए हरे-भरे वृक्षों की तुलना में अत्यंत कम वृक्षों को लगाने का लक्ष्य रखा गया।

११. भ्रष्टाचार
वनीकरण के नाम पर वन विभागों पर लाखों रुपए की धनराशि वितरित की जाती है, लेकिन वृक्ष कागजों पर उगा दिए जाते हैं और धनराशि वन विभाग के अधिकारीयों-कर्मचारियों की जेबों में चली जाती है

गोपेश्वर जिले में पुरसाड़ी के समीप बदरीनाथ वन प्रभाग द्वारा वनीकरण का साइन बोर्ड तो लगाया गया है, किंतु धरती पर कंकरीट के सिवाय कुछ नहीं है। थराली विकास खंड के कोलपुड़ी गाँवमें सिंडाल और खोला तोक में वनीकरण पर लगभग ढाई लाख की धनराशि व्यय की गई, किंतु गाँवमें कहीं भी वनीकरण नहीं किया गया है। (२१ मार्च २०१४ समाचारपत्र रिपोर्ट)

सोनभद्र में विदेशी कंपनी से मिले करोड़ों रुपये वन-विभाग को वितरित किए गए, जिन्हें वन विभाग ने गाँव के दबंगों की समिति के साथ बाँट लिए, जिनका पर्यावरण से कोई संबंध नहीं था। ये समितियाँ वनवासियों के विरुद्ध प्रपंच रचकर वनाधिकार कानून को विफल करने में जुट गईं

१२. वनवासियों का ईंधन
मिशन ट्रू बायोलॉजिस्ट संस्था द्वारा किए गए एक अनुसंधान के अनुसार उत्तराखंड में प्रतिवर्ष १२ लाख वृक्ष ईंधन के रूप में चूल्हे में जला दिए जाते हैं। वर्ष २०१३ में प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में रह रहे तीन लाख बीपीएल परिवारों ने प्रतिवर्ष ४० वृक्षों का प्रयोग किया सरकार इन परिवारों को वर्ष में १२ एलपीजी सिलेंडर नि:शुल्क प्रदान कर १२ लाख वृक्षों को बचा सकती है।

पर्यावरण और वन मंत्रालय के अनुसार वर्ष २१०० तक भारत में प्रतिवर्ष ३३ करोड़ टन लकड़ी के ईंधन की आवश्यकता होगी, जिसे वर्तमान वनों की स्थिति को देखते हुए पूरा करना असंभव है ईंधन की समस्या को दृष्टिगत रखते हुए वन मंत्रालय ने १९९०-९१ में एक योजना तैयार कर आगामी २१ वर्षों में व्यापक स्तर पर वनारोपण करने का निर्णय लिया था किंतु अन्य सरकारी योजनाओं की भाँति यह योजना भी कागजी घोड़ा सिद्ध हुई

वनवासी वर्तमान में तीन प्रकार के ईंधनों लकड़ी, गोबर के कंडे और केरोसिन का प्रयोग कर रहे हैं। रसोई गैस और सौर ऊर्जा अभी वनों में ईंधन के आंशिक विकल्प नहीं बन सके हैं।

वन संरक्षण हेतु कुछ सुझाव

(१.) अंग्रेजों की राजनीतिक एवं आर्थिक प्राथमिकताओं को देखकर बनाये गये भारतीय वन कानून में या तो आमूलचूल परिवर्तन किया जाए अथवा उसे समाप्त कर दिया जाए, जिसके कारण देश में वनों का हृास निरंतर जारी है।

वन संरक्षण हेतु ‘प्रजातांत्रिक वानिकी संस्था’ की अवधारणा लागू की जाए। यद्यपि इन प्रजातांत्रिक संस्थाओं का प्रभाव क्षेत्र अत्यंत सीमित रहा है और छोटे-छोटे विवादों पर ये टूटकर बिखरी हैं, किंतु उत्तराखंड की वन पंचायतें तत्कालीन औपनिवेशिक शासन से संघर्ष करते हुए अपने कदमों पर मजबूती से खड़ी रहीं, स्वतंत्र भारत में उन्हें सीमित औपचारिक मान्यता प्रदान की गई है।

भारत की ७५% से अधिक अत्यंत निर्धन जनता झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश राज्य के वनवासी बहुल क्षेत्रों में निवास करती है अतः निर्धनता उन्मूलन हेतु स्थानीय वनवासी समुदाय को उनके वन संसाधनों के प्रबंध एवं उपयोग हेतु पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए। उदाहरणार्थ भारत के १,७३,००० ग्रामों में वन भूमि उपलब्ध है। वन विभाग के वनीकरण कार्यक्रम सरकारी पहल एवं धन पर निर्भर हैं और वनकर्मियों में वनवासियों के सदृश वनों के प्रति आत्मीयता दृष्टिगोचर नहीं होती वन संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य वन-प्रेमी वनवासियों के हाथों से छीनकर वेतनभोगी वनकर्मियों को देना सरकार की अदूरदर्शिता एवं तात्कालिक लाभवृत्ति का परिचायक है

भारतीय संविधान के अंतर्गत मतदान द्वारा चयनित पंचायती राज संस्थाओं को सामाजिक एवं कृषि वानिकी का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। अतः यह आवश्यक है कि उत्तराखंड जैसी वन पंचायती संस्थाओं का गठन कर ग्राम वन उनके अधीन कर दिए जाएँ।

सरकार देश के प्रत्येक गाँव में एक ग्राम वन बनाए और उसका उत्तरदायित्व पूर्ण रूप से वन पंचायत को दे इस कदम से निर्धनता तो कम होगी ही, साथ ही पर्यावरणीय लाभ के चलते लोक स्वास्थ्य, जल एवं भूमि प्रबंध, वायु प्रदूषण, स्थानीय जलवायु परिवर्तन पर होने वाले व्ययों में भी कमी आएगी।

(२.) पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित किए जाएँ ताकि लोग वृक्षों की कटाई न करें।

(३.) पुत्री के जन्म पर पांच इमारती वृक्ष यथा-सागौन, शीशम, साल वन का वृक्षारोपण स्वयं की भूमि अथवा वृक्षारोपण हेतु संरक्षित शासकीय भूमि में कर उसकी देखभाल पालक द्वारा की जाए। कन्या के विवाह योग्य होने पर २० वर्षों के उक्त इमारती वृक्ष को शासन-अधीन कर देने पर कन्या के विवाह के लिए शासन की ओर से २ लाख रूपए देय हों।

(४.) पुत्र के जन्म पर पांच फलदार पौधे लगाए जाने चाहिए। इसके लिए शासकीय नौकरी के समय साक्षात्कार में पांच अंक उसे बोनस के रूप में दिए जाने की व्यवस्था हो।

(५.) सरकार उन उद्यमियों से बड़ी संख्या में वृक्षारोपण करवाएं जो अपना उद्योग चलाकर पर्यावरण को नुकसान पंहुचाते हैं।

(६.) सरकार आरा मशीनों के लाईसेंसों की जांच करने और उन पर निगरानी रखने के निर्देश दिए।

(७.) नवीन भवनों के निर्माण के समय यह अनिवार्य नियम बनाया जाए कि जितने वृक्ष कटेंगें उतने वृक्ष लगाने और उनकी देख-रेख करने का उत्तरदायित्व संबंधित व्यक्ति या संस्थान का हो

(८.) जन्मदिवस पर या विशिष्ट अवसरों पर वृक्ष लगाने की भावना को जागृत किया जाय साथ ही किसी एक वृक्ष का उत्तरदायित्व यदि एक परिवार ले सके

(९.) पर्वों, विशिष्ट अवसरों यथा विवाह, कन्या की विदाई आदि पर पेड़-पौधे उपहार में देने की प्रथा का प्रचलन हो

(१०.) वृक्ष पूजन परंपरा को पुनर्जीवित कर प्रकृति से भावात्मक सम्बन्ध स्थापित करने पर बल दिया जाए पर्वों और धार्मिक उत्सवों पर सार्वजनिक वृक्ष-पूजन परंपरा का आयोजन किया जाए

(११.) उत्तम साहित्य के सृजन द्वारा मनुष्य में वृक्षों के प्रति अपार श्रद्धा उत्पन्न की जाए

(१२.) पौध रोपण के पश्चात पौधों के संरक्षण और संवर्धन के लिए समाज में जागृति लाई जाए और वृक्षारोपण को एक स्वैच्छिक अनुष्ठान के रूप में चलाया जाए

(१३.) नदियों के तटों पर बड़ी संख्या में वृक्ष लगाकर मिट्टी को बांधा जा तथा रेन वाटर हार्वेस्टिंग की बड़े पैमाने पर व्यवस्था की जाये।

(१४.) वृक्षों की खेती को बढ़ावा दिया जाए इससे पैदावार पांच से दस गुना अधिक होगी और मिट्टी का क्षरण रुकेगा।

(१५.) वन कटाई पर सख्त प्रतिबंध हेतु कड़े कानून बनाए जाएँ

(१६.) देहरादून स्थित भारतीय वन सर्वेक्षण ने दावाग्नि की सूचना पहुंचाने हेतु सैटेलाइट आधारित प्रणाली विकसित की है, जिससे जंगल में कहीं भी आग लगने के चार घंटे के अंदर उस क्षेत्र में नियुक्त डीएफओ के मोबाइल पर इसकी सूचना आ जाती है। मध्यप्रदेश के वन विभाग द्वारा विकसित स्वतः सूचना प्रणाली में सैटेलाइट के माध्यम से आग की सूचना भारतीय वन सर्वेक्षण के साथ-साथ वन विभाग के पास भी पहुँच जाती है और चार घंटे का विश्लेषण का समय नष्ट नहीं होता।

(१७.) लोगों को अपने पिता-माता और संबंधियों की स्मृति में पत्थर के स्थान पर पौधे लगाने के लिए जागरूक किया जाए और उसकी देख भाल परिवार के सदस्य के रूप में करें

(१८.) प्रत्येक घर में कम से कम एक वृक्ष लगाने को लोगों को प्रेरित किया जाए

(१९.) प्रत्येक विद्यालय में हर्बल गार्डन बनाए जाएं, जिससे विद्यार्थी प्रकृति माँ के प्रति आत्मीयता स्थापित कर सकें

(२०.) सार्वजनिक स्थलों पर अधिक से अधिक वृक्ष लगाए जाएं

(२१.) राजस्थान के विश्नोई समाज में पशु-पक्षी एवं वनों के प्रति जो प्रेम है, उस भावना का स्थानांतरण जन-जन में हो।

डॉ. राष्ट्र बन्धु ने वनों के नाश के प्रति चिंता प्रकट करते हुये एक नवीन अभियान का आह्वान करते हुए लिखा है –

जन-जन का कल्याण,
जन-जन का उत्थान।
एक नया अभियान॥
पर्यावरण शुद्ध रखेंगे,
वृक्ष लगायेंगे।
दुखद प्रदूषण दूर करेंगे,
कष्ट भगायेंगे॥
हमारा है संकल्प महान।
हमारा एक नया अभियान॥

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